सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सरकारी कर्मचारी द्वारा रिश्वत लेने से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी को सिर्फ इस आधार पर भ्रष्टाचार का दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि किसी बिचौलिये को उसके नाम पर पैसे दिए गए थे। शिकायतकर्ता को यह अलग से साबित करना होगा कि बिचौलिया उस कर्मचारी के कहने पर या उसके फायदे के लिए काम कर रहा था, और रिश्वत की मांग खुद कर्मचारी ने ही की थी।
RPF के पूर्व अधिकारी को सभी आरोपों से बरी किया
कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामले में पूर्व रेलवे सुरक्षा बल (RPF) अधिकारी भरत राज मीणा को बरी कर दिया, क्योंकि यह साबित नहीं हो पाया कि बिचौलियों ने जो पैसे लिए, वे आरोपी तक पहुँचे या उसने खुद रिश्वत ली। ज्यादातर सबूत उन सरकारी गवाहों की गवाही पर टिके थे जिन्हें माफी देकर गवाह बनाया गया था, और उनकी बात की अलग से पुष्टि नहीं हुई थी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिस्वर सिंह की बेंच ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी को दोषी ठहराने से पहले यह पक्के सबूतों से साबित करना जरूरी है कि बिचौलिया उसी के कहने पर या उसके फायदे के लिए काम कर रहा था। सिर्फ किसी तीसरे व्यक्ति के पैसे लेने से कर्मचारी को दोषी नहीं माना जा सकता।
आगे यह भी कहा कि भले ही यह मान लिया जाए कि रिश्वत मांगी गई थी और बिचौलिये को पैसे दिए गए थे, फिर भी सिर्फ अंदाजे के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपी ने खुद रिश्वत ली या लेने वाला था।
कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण कानून की धारा 20 का कानूनी अनुमान भी यहाँ लागू नहीं होता, क्योंकि इसके लिए पहले यह साबित होना जरूरी है कि आरोपी ने खुद रिश्वत ली, जो इस मामले में साबित नहीं हुआ। अभियोजन सिर्फ इतना साबित कर सका कि शिकायतकर्ता और एक बिचौलिये के बीच पैसों का लेनदेन हुआ, जिसमें आरोपी का नाम लिया गया। लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि आरोपी ने खुद रिश्वत ली।
आरोपी की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता पेश हुईं, जबकि सरकार की तरफ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल राजकुमार भास्कर ठाकरे मौजूद रहे।
यह मामला सीबीआई की जांच से जुड़ा था। आरोप था कि आरोपी, जो उस समय रेलवे सुरक्षा बल (RPF) पालक्काड में डिविजनल सिक्योरिटी कमिश्नर थे, तबादले और पोस्टिंग के लिए RPF कर्मचारियों से रिश्वत मांगते और लेते थे। कहा गया कि इसके लिए उन्होंने अपने मातहत अफसरों को बिचौलिये के तौर पर इस्तेमाल किया।
कोर्ट ने सीबीआई की जांच प्रक्रिया पर उठाए सवाल
सीबीआई की विशेष अदालत, एर्नाकुलम ने दो अलग मामलों में आरोपी को दोषी ठहराया था। एक मामला पी.पी. नंदकुमार की शिकायत पर बिछाए गए ट्रैप से जुड़ा था, और दूसरे में तीन लेनदेन शामिल थे। अपील में सिर्फ एन.पी. गोपी कुमार वाला लेनदेन ही सामने था। केरल हाई कोर्ट ने पहले दोनों मामलों में सजा बरकरार रखी थी।
ट्रैप वाले मामले की जांच करते हुए सुप्रीम कोर्ट को शिकायतकर्ता और माफी पाए बिचौलिये की बातों में बड़ा फर्क मिला कि पैसे कैसे दिए जाने थे।
कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि अगर आरोपी ने खुद रिश्वत मांगी थी, तो जब पैसे उसे सीधे दिए गए, तब उसने लेने से इनकार क्यों किया और बिचौलिये के जरिए पैसे भेजने को क्यों कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के तरीके पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि सीबीआई ने बिचौलिये से पैसे मिलते ही ट्रैप बंद कर दिया, जबकि अगर पैसे आरोपी तक पहुँचने दिए जाते तो सीधा सबूत मिल सकता था।
दूसरे लेनदेन के बारे में कोर्ट ने कहा कि आरोपी की उसी समय की डायरी से पता चलता है कि जिस दिन कथित मुलाकात हुई बताई गई, उस दिन वह पालक्काड में मौजूद ही नहीं था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि माफी पाया गया गवाह और रिश्वत देने वाला व्यक्ति दोनों उसी लेनदेन में शामिल थे, इसलिए बिना अलग पुष्टि के उनकी गवाही काफी नहीं मानी जा सकती।
बेंच ने कहा कि इस मामले में एक और बात ध्यान देने लायक है — अभियोजन काफी हद तक उन्हीं लोगों की गवाही पर टिका है जिन्हें पहले आरोपी बनाया गया था और बाद में माफी देकर गवाह बना दिया गया। सह-अपराधी की गवाही से जुड़ा कानून पहले से ही तय है।
कोर्ट ने एविडेंस एक्ट की धारा 133 का हवाला देते हुए कहा कि सह-अपराधी एक वैध गवाह होता है, और सिर्फ उसकी बिना पुष्टि वाली गवाही पर सजा देना गैरकानूनी नहीं है।
लेकिन बेंच ने कहा कि धारा 114 के उदाहरण (b) में एक सावधानी बरतने की सलाह दी गई है — बिना अलग पुष्टि के सह-अपराधी की गवाही को आमतौर पर पूरी तरह भरोसेमंद नहीं माना जाता, जब तक जरूरी बातों की पुष्टि न हो जाए।
दोनों अपीलों को मंजूर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने उसके जमानत बांड खत्म करने और जमा किए गए जुर्माने की राशि वापस करने का आदेश दिया।
मामले का शीर्षक: Bharat Raj Meena v. Central Bureau of Investigation
न्यूट्रल साइटेशन: 2026 INSC 999

